🚩 शिर्डी में एक छोटा मंदिर है — जहाँ बाबा को पहली बार “साई” कहा गया था। और यही वह क्षण था जब “साईबाबा” नाम का जन्म हुआ।
ज़्यादातर भक्त शिर्डी जाते हैं — समाधि मंदिर, द्वारकामाई, चावड़ी, लेंडी बाग़। पर एक मंदिर ऐसा है जो इन सबकी कहानी से पहले आता है — खंडोबा मंदिर। और इसकी कहानी बहुत प्यारी है।
🕉️ खंडोबा कौन हैं?
🙏 म्हालसापति — बाबा के पहले भक्त
खंडोबा मंदिर के पुजारी थे — म्हालसापति। एक भोले, श्रद्धालु पुजारी।
जब 1854 में बाबा पहली बार शिर्डी आए — एक 16 साल के नौजवान के रूप में — तो म्हालसापति ही पहले गाँववाले थे जिन्होंने उन्हें पहचाना। बाक़ी लोग बाबा को “पागल फ़कीर” समझकर हँसते थे, बच्चे पत्थर मारते थे। पर म्हालसापति को पहली नज़र में ही दिख गया कि यह कोई साधारण नौजवान नहीं है।
🌸 1858 — वह ऐतिहासिक पल
तीन साल बाबा शिर्डी में रहे, फिर अचानक ग़ायब हो गए। कुछ समय बाद, 1858 में, बाबा फिर लौटे — इस बार चाँद पाटिल की बारात के साथ।
जब बारात की बैलगाड़ियाँ शिर्डी की सीमा पर — खंडोबा मंदिर के पास — रुकीं, म्हालसापति बाहर खड़े थे।
जैसे ही उन्होंने बाबा को बारात से उतरते देखा — उन्हें वही नौजवान फ़कीर याद आ गया जो तीन साल पहले गाँव में था। उनकी आँखें भर आईं। और उनके मुँह से सहज ही निकला —
“या साई!”
(आइए, साई!)
— म्हालसापति, खंडोबा मंदिर, 1858
साई यानी संत, पवित्र आत्मा। यह एक आदर का शब्द था, एक स्वागत था।
उसी पल से — बाबा को साईबाबा कहा जाने लगा। और यह नाम आज करोड़ों भक्तों की ज़ुबान पर है।
🛕 आज खंडोबा मंदिर
खंडोबा मंदिर समाधि मंदिर से पैदल थोड़ी ही दूरी पर है। यह छोटा है, साधारण है, पर इतिहास से भरा हुआ है।
जब आप वहाँ खड़े होते हैं — बस सोचिए: यहीं, इसी जगह, 1858 में एक पुजारी ने बाबा को “साई” कहा था। और एक नाम बन गया जो आज हर भक्त के दिल में है।
🙏 जब आप जाएँ
खंडोबा मंदिर में दर्शन के लिए कोई पास नहीं चाहिए, कोई शुल्क नहीं है। बस कुछ पल वहाँ बिताइए। म्हालसापति का स्मरण करिए — बाबा के उस पहले भक्त का, जिसकी एक पुकार से इतिहास बना।
बाबा के बारे में ऐसी ही और कहानियाँ चाहिए? कमेंट में बताइए। 🙏

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