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“साई” — यह नाम बाबा को कैसे मिला? बहुत कम लोग असली कहानी जानते हैं

हम उन्हें “साईबाबा” कहते हैं। पर क्या आपको पता है — यह नाम उनका असली नाम नहीं था? और जिस पल यह नाम पड़ा, वह एक संयोग जैसा था। बहुत कम लोग असली कहानी जानते हैं। 🚩

🛕 वह पल

लगभग 1858 की बात है। चाँद पाटिल की बारात शिर्डी पहुँची।

बैलगाड़ियाँ खंडोबा मंदिर के पास रुकीं
बारात की बैलगाड़ियाँ खंडोबा मंदिर के पास रुकीं। बारात के लोग एक-एक करके उतरने लगे।
उनके साथ एक नौजवान फ़कीर भी उतरा
उनके साथ एक नौजवान फ़कीर भी उतरा — शांत, अनजान, किसी ने सोचा भी नहीं था कि वे आगे क्या बनेंगे।
म्हालसापति ने उन्हें देखा
मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने उस नौजवान को देखा। और सहज ही उनके मुँह से निकला — 'या साई!' (आइए, साई!)।

या साई! — आइए, साई!

म्हालसापति, खंडोबा मंदिर के पास नौजवान फ़कीर का स्वागत करते हुए

🙏 और नाम पड़ गया

“साई” — यानी संत, पवित्र आत्मा। म्हालसापति ने आदर से यह कहा। उस दिन के बाद, गाँव के बाक़ी लोग भी उन्हें “साई” कहने लगे। धीरे-धीरे “साईबाबा” — और यही नाम आज करोड़ों भक्तों की ज़ुबान पर है।

✨ सोचिए

जो नाम आज दुनिया भर में पूजा जाता है, वह किसी ने सोच-समझकर नहीं रखा। वह एक भक्त के प्रेम और आदर से सहज ही निकला।

शायद यही बाबा की लीला है — साधारण पलों में असाधारण बातें छिपी होती हैं। जिन बाबा का नाम यहाँ से शुरू हुआ, उन्हीं ने समाधि से ग्यारह वचन भी छोड़े — वे शब्द जिन्हें करोड़ों भक्त आज भी दर्शन से पहले मन में दोहराते हैं।

जब आप शिर्डी जाएँ
जिस खंडोबा मंदिर के पास म्हालसापति ने पहली बार ‘या साई’ कहा था, वह आज भी है। उसे एक शांत पहला पड़ाव बनाइए — वही जगह जहाँ से नाम शुरू हुआ। उस जगह की पूरी कहानी: खंडोबा मंदिर, शिर्डी — जहाँ बाबा को पहली बार ‘साई’ कहा गया

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🙏 ॐ साईं राम।

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