Guide6 मिनट पढ़ें·1 जुलाई 2026· views

साईं बाबा के अंतिम दिन — महासमाधि की पूरी कथा (सत्चरित्र से)

🚩 15 अक्टूबर 1918, विजयादशमी का दिन — यही वह दिन था जब साईं बाबा ने अपनी देह त्यागकर महासमाधि ली। पर बाबा के जाने की यह कथा सिर्फ़ एक अंत नहीं — यह प्रेम, त्याग और इस आश्वासन की कथा है कि बाबा आज भी हमारे साथ हैं। आइए, सत्चरित्र के आधार पर यह पूरी कथा जानें।

टूटी हुई ईंट
बाबा की जीवनभर की साथी — पहला संकेत।
तात्या को जीवनदान
बाबा ने उनकी मृत्यु स्वयं ले ली।
नौ सिक्के
लक्ष्मीबाई को अंतिम प्रसाद और शिक्षा।
समाधि से भी साथ
"मैं समाधि से भी सक्रिय रहूँगा।"

🧱 पहला संकेत — टूटी हुई ईंट

बाबा के पास द्वारकामाई में एक पुरानी ईंट थी, जिस पर वे हाथ टिकाते और रात को उसी के सहारे ध्यान करते थे। यह ईंट सालों से उनकी साथी थी। एक दिन बाबा की अनुपस्थिति में, सफ़ाई करते समय एक बालक के हाथ से वह ईंट गिरकर दो टुकड़ों में टूट गई। जब बाबा ने देखा, तो दुखी होकर बोले —

"यह ईंट नहीं, मेरा भाग्य टूटा है। यह जीवनभर मेरी साथी रही, इसी के सहारे मैं आत्मा का ध्यान करता था; यह मुझे प्राणों के समान प्रिय थी। आज यह मुझे छोड़ गई।"

बाबा, टूटी ईंट देखकर

यही बाबा के जाने का पहला संकेत था।

📖 बाबा ने पहले से तैयारी की

बाबा जानते थे कि समय निकट है। उन्होंने श्री वझे से “रामविजय” ग्रंथ का पाठ कराया — पहले एक बार, फिर दिन-रात। अंतिम दो-तीन दिन उन्होंने भिक्षा के लिए जाना बंद कर दिया और शांत होकर द्वारकामाई में बैठ गए। फिर भी भक्तों को यही समझाते रहे — “घबराना मत, हिम्मत मत हारना।”

🙏 तात्या को जीवनदान — बाबा का सबसे बड़ा त्याग

दो साल पहले बाबा ने संकेत दिया था कि तात्या पाटील विजयादशमी 1918 को चल बसेंगे। जैसे-जैसे वह दिन पास आया, तात्या गंभीर रूप से बीमार पड़ गए, और बाबा को भी बुख़ार आ गया। पर हुआ कुछ और — उस दिन तात्या अचानक स्वस्थ हो उठे, और बाबा ने मानो उनकी मृत्यु अपने ऊपर ले ली। जो जीवन तात्या का जाना था, वह बाबा ने अपने भक्त को दे दिया। यही गुरु का प्रेम है।

🌼 विजयादशमी का दिन

उस दिन दोपहर की आरती के समय बाबा का मुख क्षण-क्षण बदल रहा था — अलग-अलग भक्तों को वे अलग-अलग रूपों में दिखे: किसी को मारुति, किसी को विट्ठल, किसी को दत्तात्रेय, किसी को राम, और एक ईसाई भक्त को ईसा मसीह के रूप में। आरती के बाद बाबा ने कई भक्तों को भोजन के लिए घर भेज दिया।

🪔 नौ सिक्के — अंतिम प्रसाद, अंतिम शिक्षा

जब पास सिर्फ़ लक्ष्मीबाई शिंदे और बायजी रह गए, बाबा ने अपनी जेब में हाथ डाला और पहले ₹5, फिर ₹4 — कुल नौ सिक्के लक्ष्मीबाई को दिए। ये नौ सिक्के नवविधा भक्ति (भक्ति के नौ रूप) का प्रतीक थे — बाबा की अंतिम शिक्षा कि भक्ति और समर्पण ही सब कुछ है। लक्ष्मीबाई ने जीवनभर बाबा की सेवा की थी; यह उनका अंतिम प्रसाद था।

🌊 अंतिम क्षण

फिर बाबा ने धीरे से कहा कि उन्हें यहाँ अच्छा नहीं लग रहा — “मुझे बूटी के दगड़ी (पत्थर के) वाड़े में ले चलो, वहाँ मैं ठीक रहूँगा।” इतना कहकर बाबा बायजी के शरीर पर टिक गए और अंतिम साँस ली। भगोजी ने देखा कि साँस रुक गई है; नानासाहेब ने मुख में जल डाला, “ओ देवा!” पुकारा — बाबा ने एक पल आँखें खोलीं, धीरे से “आ” कहा, और देह त्याग दी। समय था दोपहर करीब ढाई बजे

पल भर में पूरी शिर्डी रो पड़ी। हर घर ने बाबा की कोई न कोई लीला देखी थी — कोई बेसुध गिर पड़ा, कोई गलियों में रोता दौड़ा। तब लोगों को समझ आया कि बाबा ने तात्या की मृत्यु अपने ऊपर लेकर उन्हें जीवन दिया था।

🛕 जहाँ बाबा विराजे — समाधि मंदिर

बाबा के बाद यह प्रश्न उठा कि देह कहाँ रखी जाए। आख़िर रामचंद्र पाटील के दृढ़ निश्चय से तय हुआ कि बाबा को बूटी के वाड़े में ही समाधि दी जाए — वही वाड़ा आज “समाधि मंदिर” है, जहाँ करोड़ों भक्त दर्शन करते हैं।

✨ “मैं समाधि से भी साथ रहूँगा”

बाबा ने देह ज़रूर छोड़ी, पर वचन दिया था — “देह छोड़ने के बाद भी मैं सक्रिय रहूँगा। मेरी समाधि से भी मैं तुम्हारे साथ रहूँगा, तुम्हारी पुकार सुनूँगा।” यही कारण है कि शिर्डी आज भी जीवंत है — बाबा कहीं गए नहीं, वे यहीं हैं। बाबा के ग्यारह वचन भी इसी आश्वासन के विस्तार हैं।

संक्षेप में
बाबा ने विजयादशमी 1918 को द्वारकामाई में, दोपहर ढाई बजे महासमाधि ली। तात्या को जीवनदान दिया। लक्ष्मीबाई को भक्ति के नौ सिक्के दिए। और वचन दिया कि समाधि से भी सक्रिय रहेंगे — सौ साल से शिर्डी इसी वचन के साये में जी रहा है।

📍 शिर्डी में बाबा की समाधि के दर्शन

अगर आप बाबा की समाधि के दर्शन की सोच रहे हैं, तो मंदिर के पैदल दूरी पर रुकें — TripSaffron पर शिर्डी के verified hotels मिलते हैं, असली फ़ोटो और असली दूरी के साथ, free cancellation की सुविधा। (पूरी price + सुविधा जानकारी: शिर्डी में मंदिर के पास बजट होटल — गाइड।)

बुकिंग: tripsaffron.com/search?city=shirdi

हर साल विजयादशमी पर बाबा की पुण्यतिथि (महासमाधि उत्सव) शिर्डी में बड़े भक्ति-भाव से मनाई जाती है। ॐ साईं राम। 🚩

Was this helpful?

Comments

0/2000
कॉल करें
Shirdi to Shani Shingnapur, Nashik — in one day
Sedan or Ertiga, driver waits at the temple, all-inclusive. Book direct, no haggling.
See packages →

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

साईं बाबा ने महासमाधि कब ली?
विजयादशमी, 15 अक्टूबर 1918, दोपहर लगभग 2:30 बजे। उन्होंने अपने सबसे क़रीबी भक्तों के बीच द्वारकामाई में देह त्यागी।
टूटी ईंट की घटना क्या थी?
बाबा द्वारकामाई में एक पुरानी ईंट रखते थे जिस पर वे रात को ध्यान के समय हाथ टिकाते थे। बाबा की अनुपस्थिति में एक बालक के हाथ से वह गिरकर टूट गई। बाबा ने लौटकर देखा और कहा — "यह ईंट नहीं, मेरा भाग्य टूटा है।" यही पहला संकेत था।
बाबा ने तात्या को कैसे जीवनदान दिया?
बाबा ने दो साल पहले संकेत दिया था कि तात्या विजयादशमी 1918 को चल बसेंगे। जैसे-जैसे वह दिन पास आया, तात्या गंभीर बीमार हुए और बाबा को भी बुख़ार आ गया। उस दिन तात्या स्वस्थ हो उठे और बाबा ने मानो उनकी मृत्यु अपने ऊपर ले ली — यही गुरु का सर्वोच्च प्रेम है।
लक्ष्मीबाई शिंदे को दिए नौ सिक्कों का अर्थ क्या है?
अंतिम क्षण में बाबा ने लक्ष्मीबाई को पहले ₹5 फिर ₹4 — कुल नौ सिक्के दिए। ये नवविधा भक्ति (भक्ति के नौ रूप) का प्रतीक थे — बाबा की अंतिम शिक्षा कि भक्ति और समर्पण ही सब कुछ है।
बाबा की समाधि आज कहाँ है?
बूटी वाड़े में — वही पत्थर का वाड़ा जहाँ बाबा ने स्वयं ले जाने को कहा था। आज वही इमारत शिर्डी का समाधि मंदिर है, जहाँ हर साल करोड़ों भक्त दर्शन करते हैं।
बाबा की पुण्यतिथि कब मनाई जाती है?
हर साल विजयादशमी पर (महासमाधि के दिन)। महासमाधि उत्सव शिर्डी के तीन बड़े उत्सवों में से एक है — राम नवमी और गुरु पूर्णिमा के साथ।

🙏 आपकी यात्रा मंगलमय हो। ॐ साईं राम।

सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली

यह भी पढ़ें