🚩 15 अक्टूबर 1918, विजयादशमी का दिन — यही वह दिन था जब साईं बाबा ने अपनी देह त्यागकर महासमाधि ली। पर बाबा के जाने की यह कथा सिर्फ़ एक अंत नहीं — यह प्रेम, त्याग और इस आश्वासन की कथा है कि बाबा आज भी हमारे साथ हैं। आइए, सत्चरित्र के आधार पर यह पूरी कथा जानें।
🧱 पहला संकेत — टूटी हुई ईंट
बाबा के पास द्वारकामाई में एक पुरानी ईंट थी, जिस पर वे हाथ टिकाते और रात को उसी के सहारे ध्यान करते थे। यह ईंट सालों से उनकी साथी थी। एक दिन बाबा की अनुपस्थिति में, सफ़ाई करते समय एक बालक के हाथ से वह ईंट गिरकर दो टुकड़ों में टूट गई। जब बाबा ने देखा, तो दुखी होकर बोले —
"यह ईंट नहीं, मेरा भाग्य टूटा है। यह जीवनभर मेरी साथी रही, इसी के सहारे मैं आत्मा का ध्यान करता था; यह मुझे प्राणों के समान प्रिय थी। आज यह मुझे छोड़ गई।"
— बाबा, टूटी ईंट देखकर
यही बाबा के जाने का पहला संकेत था।
📖 बाबा ने पहले से तैयारी की
बाबा जानते थे कि समय निकट है। उन्होंने श्री वझे से “रामविजय” ग्रंथ का पाठ कराया — पहले एक बार, फिर दिन-रात। अंतिम दो-तीन दिन उन्होंने भिक्षा के लिए जाना बंद कर दिया और शांत होकर द्वारकामाई में बैठ गए। फिर भी भक्तों को यही समझाते रहे — “घबराना मत, हिम्मत मत हारना।”
🙏 तात्या को जीवनदान — बाबा का सबसे बड़ा त्याग
दो साल पहले बाबा ने संकेत दिया था कि तात्या पाटील विजयादशमी 1918 को चल बसेंगे। जैसे-जैसे वह दिन पास आया, तात्या गंभीर रूप से बीमार पड़ गए, और बाबा को भी बुख़ार आ गया। पर हुआ कुछ और — उस दिन तात्या अचानक स्वस्थ हो उठे, और बाबा ने मानो उनकी मृत्यु अपने ऊपर ले ली। जो जीवन तात्या का जाना था, वह बाबा ने अपने भक्त को दे दिया। यही गुरु का प्रेम है।
🌼 विजयादशमी का दिन
उस दिन दोपहर की आरती के समय बाबा का मुख क्षण-क्षण बदल रहा था — अलग-अलग भक्तों को वे अलग-अलग रूपों में दिखे: किसी को मारुति, किसी को विट्ठल, किसी को दत्तात्रेय, किसी को राम, और एक ईसाई भक्त को ईसा मसीह के रूप में। आरती के बाद बाबा ने कई भक्तों को भोजन के लिए घर भेज दिया।
🪔 नौ सिक्के — अंतिम प्रसाद, अंतिम शिक्षा
जब पास सिर्फ़ लक्ष्मीबाई शिंदे और बायजी रह गए, बाबा ने अपनी जेब में हाथ डाला और पहले ₹5, फिर ₹4 — कुल नौ सिक्के लक्ष्मीबाई को दिए। ये नौ सिक्के नवविधा भक्ति (भक्ति के नौ रूप) का प्रतीक थे — बाबा की अंतिम शिक्षा कि भक्ति और समर्पण ही सब कुछ है। लक्ष्मीबाई ने जीवनभर बाबा की सेवा की थी; यह उनका अंतिम प्रसाद था।
🌊 अंतिम क्षण
फिर बाबा ने धीरे से कहा कि उन्हें यहाँ अच्छा नहीं लग रहा — “मुझे बूटी के दगड़ी (पत्थर के) वाड़े में ले चलो, वहाँ मैं ठीक रहूँगा।” इतना कहकर बाबा बायजी के शरीर पर टिक गए और अंतिम साँस ली। भगोजी ने देखा कि साँस रुक गई है; नानासाहेब ने मुख में जल डाला, “ओ देवा!” पुकारा — बाबा ने एक पल आँखें खोलीं, धीरे से “आ” कहा, और देह त्याग दी। समय था दोपहर करीब ढाई बजे।
पल भर में पूरी शिर्डी रो पड़ी। हर घर ने बाबा की कोई न कोई लीला देखी थी — कोई बेसुध गिर पड़ा, कोई गलियों में रोता दौड़ा। तब लोगों को समझ आया कि बाबा ने तात्या की मृत्यु अपने ऊपर लेकर उन्हें जीवन दिया था।
🛕 जहाँ बाबा विराजे — समाधि मंदिर
बाबा के बाद यह प्रश्न उठा कि देह कहाँ रखी जाए। आख़िर रामचंद्र पाटील के दृढ़ निश्चय से तय हुआ कि बाबा को बूटी के वाड़े में ही समाधि दी जाए — वही वाड़ा आज “समाधि मंदिर” है, जहाँ करोड़ों भक्त दर्शन करते हैं।
✨ “मैं समाधि से भी साथ रहूँगा”
बाबा ने देह ज़रूर छोड़ी, पर वचन दिया था — “देह छोड़ने के बाद भी मैं सक्रिय रहूँगा। मेरी समाधि से भी मैं तुम्हारे साथ रहूँगा, तुम्हारी पुकार सुनूँगा।” यही कारण है कि शिर्डी आज भी जीवंत है — बाबा कहीं गए नहीं, वे यहीं हैं। बाबा के ग्यारह वचन भी इसी आश्वासन के विस्तार हैं।
📍 शिर्डी में बाबा की समाधि के दर्शन
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हर साल विजयादशमी पर बाबा की पुण्यतिथि (महासमाधि उत्सव) शिर्डी में बड़े भक्ति-भाव से मनाई जाती है। ॐ साईं राम। 🚩
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
🙏 आपकी यात्रा मंगलमय हो। ॐ साईं राम।
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