शिर्डी में बाबा को दीये जलाने का बड़ा शौक़ था। हर शाम वे द्वारकामाई और मंदिरों में कई दीये जलाते, जो रातभर जगमगाते रहते। तेल वे गाँव के बनियों से माँग लाते थे।
पर एक दिन बनिये थक गए।
बाबा बिना कुछ कहे लौट आए। द्वारकामाई पहुँचकर उन्होंने सूखी बत्तियाँ दीयों में लगा दीं और सब काम वैसे ही करते रहे — मानो कुछ हुआ ही न हो।
फिर जो हुआ…
बनिये दूर से छिपकर देख रहे थे — कि बिना तेल के बाबा अब क्या करेंगे।
बाबा ने टिन का एक छोटा डिब्बा उठाया, कुएँ पर गए और उसमें सादा पानी भरा। वापस द्वारकामाई आए, और सबकी आँखों के सामने वही पानी दीयों में तेल की जगह डाल दिया — और जला दिया।
दीये बुझे नहीं। टिमटिमाए नहीं। रातभर हर दीया पानी से जलता रहा।
बात तेल की नहीं थी — बात सच्चाई की थी।
— श्री साईं सत्चरित्र
असली सीख
बनिये काँप गए। सुबह होते-होते सब द्वारकामाई आए, बाबा के चरणों में गिरे, और माफ़ी माँगी। बाबा ने माफ़ कर दिया — पर एक छोटी सी बात कही:
“फिर कभी झूठ मत बोलना।”
यह कथा सिर्फ़ तेल और दीये की नहीं है। बाबा किसी भी चीज़ से दीया जला सकते थे। असली बात वह क्षण है जब बनियों ने “नहीं” कह दिया जबकि सच “हाँ” था — और बाबा ने उसे आर-पार देख लिया। दीये तो सिर्फ़ वह दर्पण थे जो बाबा ने उनकी अंतरात्मा के सामने रख दिया।
आज इसका क्या मतलब?
भक्त रोज़ बाबा की तस्वीर के सामने बैठकर बहुत कुछ माँगते हैं। बाबा बदले में बहुत कम माँगते हैं — वे चाहते हैं आप सच में जिएँ। दुकान पर, घर में, काम में, परिवार में। जब भी कोई छोटा झूठ बोलने का मन हो, याद कीजिए — एक रात बाबा ने पानी जलाकर तेल की तरह दिखाया था। सच्चाई, उसी दीये की तरह, ख़ुद-ब-ख़ुद जल उठती है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
आपने यह लीला पहले सुनी थी? नीचे बताइए। 🙏
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