Guide4 मिनट पढ़ें·11 जून 2026· views

साईबाबा ने पानी से दीये जलाए? — सच्ची घटना, सत्चरित्र से

शिर्डी में बाबा को दीये जलाने का बड़ा शौक़ था। हर शाम वे द्वारकामाई और मंदिरों में कई दीये जलाते, जो रातभर जगमगाते रहते। तेल वे गाँव के बनियों से माँग लाते थे।

पर एक दिन बनिये थक गए।

फ़ैसला
सबने मिलकर तय किया — अब बाबा को तेल नहीं देंगे। जब बाबा माँगने गए, सबने साफ़ मना कर दिया।

बाबा बिना कुछ कहे लौट आए। द्वारकामाई पहुँचकर उन्होंने सूखी बत्तियाँ दीयों में लगा दीं और सब काम वैसे ही करते रहे — मानो कुछ हुआ ही न हो।

फिर जो हुआ…

बनिये दूर से छिपकर देख रहे थे — कि बिना तेल के बाबा अब क्या करेंगे।

बाबा ने टिन का एक छोटा डिब्बा उठाया, कुएँ पर गए और उसमें सादा पानी भरा। वापस द्वारकामाई आए, और सबकी आँखों के सामने वही पानी दीयों में तेल की जगह डाल दिया — और जला दिया।

दीये बुझे नहीं। टिमटिमाए नहीं। रातभर हर दीया पानी से जलता रहा

बात तेल की नहीं थी — बात सच्चाई की थी।

श्री साईं सत्चरित्र

असली सीख

बनिये काँप गए। सुबह होते-होते सब द्वारकामाई आए, बाबा के चरणों में गिरे, और माफ़ी माँगी। बाबा ने माफ़ कर दिया — पर एक छोटी सी बात कही:

“फिर कभी झूठ मत बोलना।”

यह कथा सिर्फ़ तेल और दीये की नहीं है। बाबा किसी भी चीज़ से दीया जला सकते थे। असली बात वह क्षण है जब बनियों ने “नहीं” कह दिया जबकि सच “हाँ” था — और बाबा ने उसे आर-पार देख लिया। दीये तो सिर्फ़ वह दर्पण थे जो बाबा ने उनकी अंतरात्मा के सामने रख दिया।

अगर आप सत्चरित्र पढ़ते हैं
यह लीला द्वारकामाई के शुरुआती अध्यायों में आती है। पूरी पारायण विधि के लिए पढ़िए हमारी संक्षिप्त सत्चरित्र पारायण गाइड। द्वारकामाई की अन्य लीलाओं के लिए देखिए धूनी क्यों आज भी जल रही है और बाबा हर सुबह गेहूँ क्यों पीसते थे.

आज इसका क्या मतलब?

भक्त रोज़ बाबा की तस्वीर के सामने बैठकर बहुत कुछ माँगते हैं। बाबा बदले में बहुत कम माँगते हैं — वे चाहते हैं आप सच में जिएँ। दुकान पर, घर में, काम में, परिवार में। जब भी कोई छोटा झूठ बोलने का मन हो, याद कीजिए — एक रात बाबा ने पानी जलाकर तेल की तरह दिखाया था। सच्चाई, उसी दीये की तरह, ख़ुद-ब-ख़ुद जल उठती है।

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❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

"बाबा ने पानी से दीये जलाए" — यह कथा कहाँ है?
यह श्री साईं सत्चरित्र में दर्ज है — हेमाडपंत द्वारा लिखी बाबा के जीवन और लीलाओं की प्रामाणिक पुस्तक।
बाबा हर शाम दीये क्यों जलाते थे?
उन्हें द्वारकामाई और आसपास के मंदिरों में रात भर दीये जलाए रखना बहुत प्रिय था। हर शाम वे गाँव के बनियों से तेल माँग लाते थे।
बनियों ने क्या किया?
सब बनिये तेल देने से थक गए और मिलकर तय किया कि अब नहीं देंगे। जब बाबा माँगने आए, सबने मना कर दिया।
फिर बाबा ने क्या किया?
बिना कुछ कहे बाबा द्वारकामाई लौट आए, सूखी बत्तियाँ लगाईं, टिन के डिब्बे में पानी लिया और दीयों में तेल की जगह पानी भरकर जला दिया। दीये रातभर जलते रहे।
इस कथा की असली सीख क्या है?
बनिये शर्मिंदा होकर माफ़ी माँगने आए। बाबा ने माफ़ कर दिया — पर कहा: फिर कभी झूठ मत बोलना। बात तेल की नहीं थी, सच्चाई की थी।

आपने यह लीला पहले सुनी थी? नीचे बताइए। 🙏

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