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बाबा की सटका — वह छड़ी जो हमेशा उनके साथ रहती थी

साईबाबा के हाथ में हमेशा एक छड़ी रहती थी — उसका नाम और महत्व बहुत कम लोग जानते हैं। 🚩

बाबा की हर पुरानी तस्वीर देखिए — उनके हाथ में या पास में एक छोटी छड़ी ज़रूर दिखेगी। इसे “सटका” कहते हैं। यह सिर्फ़ एक छड़ी नहीं थी — यह बाबा की पहचान का हिस्सा थी।

🪔 सटका क्या था

सटका एक छोटा डंडा था जो बाबा हमेशा अपने पास रखते थे। कभी हाथ में, कभी बग़ल में। द्वारकामाई में बैठते समय भी यह उनके साथ रहता।

हमेशा साथ
चाहे शिर्डी की गलियों में चल रहे हों, द्वारकामाई में पत्थर पर बैठे हों, या भक्तों से बात कर रहे हों — सटका हमेशा साथ रहती।
अधिकार का प्रतीक
भक्त मानते हैं कि सटका बाबा की शक्ति और अधिकार का प्रतीक थी — एक गुरु का दण्ड, एक रक्षक का दण्ड।

🔥 धुनी और सटका

एक प्रसिद्ध घटना है। एक बार द्वारकामाई की धुनी की लपटें अचानक बहुत ऊँची उठ गईं। भक्त डर गए। बाबा ने अपनी सटका से ज़मीन पर वार किया और लपटों को शांत होने का आदेश दिया।

हर वार के साथ आग कम होती गई — और कुछ ही पलों में धुनी सामान्य हो गई। फिर से वही धीमी, शाश्वत लौ।

एक वार सटका का। एक आदेश। और लपटें झुक गईं।

द्वारकामाई, लगभग 19वीं सदी का अंत

🙏 आज भी सटका

बाबा की सटका आज भी शिर्डी में संभाल कर रखी गई है। हर गुरुवार रात जब पालकी समाधि मंदिर से चावड़ी की ओर निकलती है, सटका भी बाबा के चित्र और चाँदी की पादुकाओं के साथ चलती है — 100 साल पुरानी परंपरा।

जब आप शिर्डी जाएँ और बाबा की पुरानी तस्वीरें देखें, सटका को ध्यान से देखिए। यह बाबा के पूरे शिर्डी जीवन का एक मौन साथी था।

जब सटका को चलते देख सकते हैं
गुरुवार रात 9:15 बजे समाधि मंदिर में — पालकी बाबा का चित्र, पादुकाएँ, और सटका चावड़ी तक ले जाती है। हर हफ़्ते की वह जुलूस जिसे ज़्यादातर भक्त बिना देखे निकल जाते हैं।

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🙏 ॐ साईं राम।

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