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साईबाबा रोज़ गेहूँ क्यों पीसते थे — हैजे की कहानी

🚩 साईबाबा रोज़ गेहूँ क्यों पीसते थे? — वजह कोई नहीं समझ पाया।

शिर्डी में हर सुबह एक अजीब-सा दृश्य होता। बाबा द्वारकामाई में बैठते, हाथ-चक्की निकालते, और चुपचाप गेहूँ पीसने लगते। न ख़ुद रोटी बनाते, न किसी को आटा देते — फिर यह रोज़ का काम क्यों? (द्वारकामाई की एक और लीला, जो बिना कुछ कहे यही सीख देती है — पढ़िए जब बाबा ने पानी से दीये जलाए।)

वे क्या पीसते थे?
गेहूँ — हर सुबह, हाथ से, द्वारकामाई में। साठ साल बिना रुके।
क्या उन्होंने कभी नहीं किया?
न रोटी बनाई, न आटा बाँटा, न इसका कारण किसी को समझाया।
वह चक्की आज कहाँ है?
द्वारकामाई मंदिर के अंदर, प्रवेश के दाहिनी ओर काँच की पेटी में।

🌾 जिस दिन चार महिलाएँ आटा ले गईं

एक दिन चार महिलाएँ मदद को आ बैठीं। पीसते-पीसते उन्होंने आपस में सोचा — “इतना आटा बाबा हमें ही बाँट देंगे।” चक्की रुकी तो उन्होंने आटा चार हिस्सों में बाँट लिया और घर ले गईं।

यह देखकर बाबा बरस पड़े। “यह किसके बाप का माल बाँट रही हो?” उन्होंने ज़ोर से कहा। “यह आटा वापस लाओ — और गाँव की सीमा पर बिखेर दो।”

🪔 गाँव की सीमा पर ही क्यों?

उस समय शिर्डी में हैजा (कॉलरा) फैला हुआ था। गाँववालों ने बाद में समझा — बाबा गेहूँ नहीं पीस रहे थे। वे उस महामारी को ही पीसकर गाँव की सीमा से बाहर कर रहे थे।

जिस दिन वह आटा सीमा पर बिखेरा गया, हैजा थमने लगा। मौतें रुक गईं। डर ख़त्म हुआ। एक ऐसा काम जो दिखता तो साधारण था — असल में पूरे गाँव की रक्षा निकला।

🌾 गहरी बात

सत्चरित्र कहता है — बाबा साठ साल तक यही “पीसने” का काम करते रहे। गेहूँ नहीं — भक्तों के कर्म, दुख और अहंकार। चक्की के दो पाट थे — कर्म और भक्ति। जब दोनों एक-साथ घूमते, तभी अनाज (अहंकार) पिसकर आटा (समर्पण) बनता।

यह किसके बाप का माल बाँट रही हो? वापस लाओ — गाँव की सीमा पर बिखेर दो।

साईबाबा, चार महिलाओं से

द्वारकामाई का दर्शन
असली चक्की मुख्य हॉल के प्रवेश के दाहिनी ओर काँच की पेटी में सुरक्षित है। मुफ़्त, 5–10 मिनट काफ़ी हैं। उसी दर्शन में धुनी भी देख आइए। उस जगह की पूरी गाइड: द्वारकामाई — कई द्वारों वाली माँ, जहाँ बाबा ने 60 साल बिताए

🙏 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

साईबाबा रोज़ गेहूँ क्यों पीसते थे?
ऊपर से देखें तो बाबा शिर्डी में फैले हैजा (कॉलरा) को ही पीसकर गाँव की सीमा से बाहर कर रहे थे। गहराई में सत्चरित्र कहता है — वे साठ साल तक भक्तों के कर्म, दुख और अहंकार को पीसते रहे।
क्या बाबा ख़ुद वह आटा खाते थे?
नहीं। उन्होंने न तो रोटी बनाई, न ही किसी को आटा बाँटा। आटा गाँव की सीमा पर बिखेरने के लिए था — यही उस क्रिया का असली मक़सद था।
उन चार महिलाओं का क्या हुआ जिन्होंने आटा बाँट लिया था?
बाबा ने सख़्ती से डाँटा — "यह किसके बाप का माल बाँट रही हो?" — और कहा कि यह आटा गाँव की सीमा पर बिखेर दो। उसी आटे ने जब बिखरकर सीमा पार की, हैजा थमने लगा।
चक्की के दो पाटों का क्या अर्थ है?
सत्चरित्र में दो पाट कर्म और भक्ति का प्रतीक हैं — भक्त के जीवन की दो पीसने वाली सतहें। बाबा का संदेश था: जब दोनों एक-साथ हों, तभी अनाज (अहंकार) पिसकर आटा (समर्पण) बनता है।
क्या वह चक्की आज भी द्वारकामाई में रखी है?
हाँ। बाबा की वह हाथ-चक्की द्वारकामाई मंदिर के अंदर सुरक्षित रखी गई है। मुख्य हॉल में प्रवेश करते ही दाहिनी ओर एक काँच की पेटी में दिखती है।

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🙏 ॐ साईं राम।

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